रविवार, 28 अक्तूबर 2018

Book Review भीग गया मन

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/P/PradeepSrivastava/apne_samya_ko_ukertee_kavitayen_PustakSameeksha.htm

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

हिन्दी के वैश्विक परिदृश्य पर भारत और मॉरीशस के विद्वानों ने की चर्चा: मॉरीशस में हिन्दी उत्सव



 वाएं से विश्व हिन्दी सचिवालय के महासचिव प्रो. विनोद कुमार मिश्र, मॉरीशस के सांसद श्री विकास ओरी, भारतीय उच्चायुक्त श्री अभय ठाकुर, हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरीशस के प्रधान श्री यन्तु देव बुद्धू, मंत्री श्री धनराज शंभू और सभा को संबोधित करते परिकल्पना समय के प्रधान संपादक श्री रवीन्द्र प्रभात।
पोर्ट लुई: परिकल्पना लखनऊ, भारतीय उच्चायोग मॉरीशस और हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरीशस के संयुक्त तत्वावधान में 2 सितंबर से 8 सितंबर तक मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में आयोजित दसवां अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में लखनऊ की नौ विभूतियों सहित उत्तर प्रदेश से कुल 19 विभूतियाँ शामिल हुईं। इसके अलावा भारत के विभिन्न प्रदेशों से तथा मॉरीशस से शताधिक हिन्दी विद्वान, साहित्यकार, टेक्नोक्रेट, ब्लोगर्स तथा संस्कृतिकर्मियों ने हिस्सा लिया। इस उत्सव में भारत तथा मॉरीशस के लगभग 42 हिन्दी सेवियों को सम्मानित किया गया तथा एक दर्जन पुस्तकों का लोकार्पण हुआ।

इसके साथ ही हिन्दी के वैश्विक परिदृश्य पर भारत और मॉरीशस के विद्वानों ने चर्चा की। साथ ही मुंबई के सागर त्रिपाठी
, मॉरीशस के डॉ. हेमराज सुंदर, लखनऊ की डॉ. मिथिलेश दीक्षित तथा अमेठी के जगदीश पीयूष की अध्यक्षता में चार काव्य संध्याएँ सम्पन्न हुईं। 



परिकल्पना समय मासिक के प्रधान संपादक लखनऊ निवासी रवीन्द्र प्रभात ने बताया कि इस उत्सव में लखनऊ से अवधी की लोकगायिका कुसुम वर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित, शिक्षाविद डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, साहित्यकार व समाजसेवी सत्या सिंह 'हुमैन', हिन्दी विकिपीडिया की प्रबन्धक माला चौबे, नाट्यकर्मी राजीवा प्रकाश, संस्कृतिकर्मी आभा प्रकाश, परिकल्पना के कोषाध्यक्ष शुभ चतुर्वेदी 'शुभेन्दु' सम्मिलित हुये। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से साहित्यकार व शिक्षाविद डॉ. मीनाक्षी सक्सेना 'कहकशाँ' और डॉ. अरुण कुमार शास्त्री, इलाहाबाद से नाट्यकर्मी डॉ. प्रतिमा वर्मा व मास्टर अर्णव वर्मा, सुल्तानपुर से वरिष्ठ अवधी साहित्यकार डॉ. राम बहादुर मिश्र, आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप और डॉ. ओंकार नाथ द्विवेदी, कानपुर से डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल अमिय अमेठी से जगदीश पीयूष वाराणसी से दीनानाथ द्विवेदी रंग, सचीन्द्र नाथ मिश्र और अभिलेश वर्मा देवरिया से पुरातत्वविद डॉ. रमाकांत कुशवाहा गोंडा से शिव पूजन शुक्ल और आगरा से डॉ. सुषमा सिंह, डॉ पूनम तिवारी, डॉ प्रभा गुप्ता और डॉ रमेश सिंह धाकरे आदि ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वहीं उत्तराखंड से बिमल बहुगुणा और मुंबई से सागर त्रिपाठी की भी सार्थक उपस्थिति रही। 


सभी परिचर्चा सत्र और काव्य संध्याओं का आयोजन मॉरीशस के ली ग्राँ ब्ले सभागार में तथा मुख्य कार्यक्रम हिन्दी भवन लॉन्ग माउंटेन में आयोजित हुये। इस कार्यक्रम में मॉरीशस के सांसद विकास ओरी, मॉरीशस के भारतीय उच्चायुक्त श्री अभय ठाकुर, विश्व हिन्दी सचिवालय मॉरीशस के जेनरल सेक्रेटरी प्रो. विनोद कुमार मिश्र, हिन्दी प्रचारिणी सभा के प्रधान यन्तु देव बुद्धू, मंत्री धनराज शंभू और रवीन्द्र प्रभात मंचासीन थे। इस अवसर पर लखनऊ की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मिथिलेश दीक्षित और इलाहाबाद की डॉ प्रतिमा वर्मा को ग्यारह हजार रुपये, सम्मान पत्र और स्मृति चिन्ह के अंतरराष्ट्रीय शीर्ष उत्सव सम्मान प्रदान किया गया। वहीं मॉरीशस के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम देव धुरंधर को ग्यारह हजार रुपये का परिकल्पना शीर्ष कथा सम्मान, पाँच हजार रुपये का परिकल्पना साहित्यभूषण सम्मान राज हीरामन को तथा दो हजार पाँच सौ रुपये का परिकल्पना भाषा सम्मान और परिकल्पना साहित्य सम्मान क्रमश: मॉरीशस के साहित्यकार यंतू
देव बुद्धू और धनराज शंभू को प्रदान किया गया। 


इसके अलावा मॉरीशस के साहित्यकार सूर्यदेव सुबोरत, हनुमान दुबे गिरधारी, कल्पना लालजी, इंद्रदेव भोला इन्द्रनाथ, टहल रामदीन और परमेश्वर बिहारी को क्रमश: परिकल्पना हिन्दी सम्मान, परिकल्पना सृजन सम्मान, परिकल्पना काव्य सम्मान, परिकल्पना संस्कृति सम्मान, परिकल्पना प्रखर सम्मान और परिकल्पना प्रतिभा सम्मान प्रदान किया गया। 

इस अवसर पर भारत के लगभग 30 साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, ब्लॉगरों तथा नाट्यकर्मियों क्रमश: जगदीश पीयूष, डॉ. राम बहादुर मिश्र, डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, कुसुम वर्मा, सागर त्रिपाठी, दीनानाथ द्विवेदी ‘‘रंग‘‘, सत्या सिंह ‘‘हुमैन‘‘, डॉ. सुषमा सिंह, डॉ॰ अर्चना श्रीवास्तव, राजेश कुमारी ‘‘राज‘‘, डॉ. मीनाक्षी सक्सेना ‘‘कहकशां‘‘, डॉ.रमाकांत कुशवाहा ‘‘कुशाग्र‘‘, डॉ. प्रभा गुप्ता, डॉ. अरुण कुमार शास्त्री, डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ. पूनम तिवारी, अदया प्रसाद सिंह ‘‘प्रदीप‘‘, शिवपूजन शुक्ल, डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल ‘‘अमिय‘‘, विमल प्रसाद बहुगुणा, सचिंद्रनाथ मिश्र, अभिलेश वर्मा, शुभ चतुर्वेदी, अर्णव वर्मा, डॉ. अरुण कुमार शास्त्री, माला चौबे आदि को अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव सम्मान प्रदान किया गया। 

इस अवसर पर परिकल्पना समय का सितंबर 2018 अंक का लोकार्पण हुआ जो मॉरीशस में हिन्दी भाषा और संस्कृति के विकास और विस्तार पर केन्द्रित है। इसके प्रधान संपादक हैं रवीन्द्र प्रभात तथा इस अंक के अतिथि संपादक हैं डॉ. राम बहादुर मिश्र। इसके अलावा त्रैमासिक
पत्रिका
‘‘प्रस्ताव‘‘ के हाइकू विशेषांक जिसकी अतिथि संपादक हैं डॉ. मिथिलेश दीक्षित, रवीन्द्र प्रभात का चैथा उपन्यास लखनऊवा कक्का, डॉ. मीनाक्षी सक्सेना ‘‘कहकशा‘‘ की कविताओं का संग्रह एहसास के जूगनू, डॉ मिथिलेश दीक्षित एवं रवीन्द्र प्रभात की संपादित पुस्तक हिन्दी के विविध आयाम,  डॉ रमाकांत कुशवाहा कुशाग्रकी कविताओं का संग्रह ढूँढे किसको बंजारा,  श्री अद्या प्रसाद सिंह प्रदीप का खंडकाव्य ‘‘तुलसीदास‘‘, अभिदेशक त्रैमासिक पत्रिका जिसके संपादक हैं डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ मिथिलेश दीक्षित की पुस्तक हिन्दी हाईकू संदर्भ और विमर्श, सागर त्रिपाठी का काव्य संग्रह शब्दबेध के साथ-साथ हिन्दी प्रचारिणी सभा की हस्तलिखित पत्रिका दूरगा का मुद्रित अंक, डॉ हेमरज सुंदर और राज हीरामन की पुस्तकों के साथ मॉरीशस के लगभग आधा दर्जन साहित्यकारों को पुस्तकों का भी लोकार्पण संपन्न हुआ। साथ ही इस अवसर पर श्रीमती कुसुम वर्मा के रेखाचित्र और पेंटिंग्स, आभा प्रकाश की एम्ब्राइडरी तथा डॉ. अर्चना श्रीवास्तव के विचारों पर आधारित कला वीथिका की प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रहा। 


इसमें चार परिचर्चा सत्र थे, प्रथम परिचर्चा सत्र का विषय था  ‘‘हिन्दी के वैश्विक परिदृश्य के निर्माण में साहित्यकारों की भूमिका‘‘, द्वितीय परिचर्चा सत्र का विषय था ‘‘हिन्दी के वैश्विक प्रसार में महिलाओं की भूमिका‘‘, तृतीय परिचर्चा सत्र का विषय था ‘‘मॉरीशस में अवधी तथा भोजपुरी बोलियों के प्रभाव में कमी‘‘ तथा चतुर्थ सत्र था ‘‘हिन्दी में हाइकु की दिशा और दृष्टि‘‘  

प्रसिद्ध रंगकर्मी, टेली धारावाहिक एवं हिन्दी फिल्म अभिनेत्री डॉ. प्रतिमा वर्मा की नाट्य प्रस्तुति ‘‘अकेलापन‘‘ तथा हॉलीवूड, वॉलीवूड और उत्तरांचली फिल्मों के अभिनेता श्री बिमल बहुगुणा द्वारा पंडवानी की तरह उत्तरांचली काव्य कवितावली की प्रस्तुति भावभंगिमा के साथ की गयी। संयुक्त परिवार पर आधारित राजीवा प्रकाश और कुसुम वर्मा की नाट्य प्रस्तुति दर्शकों को भाव विभोर करने
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही इस अवसर पर कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया
है
, जिसमें मॉरीशस और भारत के लगभग दो दर्जन कवियों ने भाग लिया।



सभा के मुख्य अतिथि मॉरीशस के सांसद व पीपीएस मंत्री श्री विकास ओरी ने रामचरित मानस और हिन्दी की महत्ता को प्रतिपादित करते हुये कहा कि "रामायण और हिन्दी के बिना मॉरीशस अधूरा है।"

सभा को संबोधित करते हुये मॉरीशस में भारत के उच्चायुक्त श्री अभय ठाकुर ने कहा कि "हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने हेतु हम प्रयासरत हैं। यह कार्य तभी संभव होगा जब सभी देश अपनी ओर से सहयोग राशि दें जो कठिन तो है, किन्तु असंभव भी नहीं है। हम इसी लक्ष्य कि ओर बढ़ रहे हैं। कुछ अड़चने हैं जिसे दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।"


विश्व हिन्दी सचिवालय के महासचिव प्रो विनोद कुमार मिश्र ने मॉरीशस में स्थापित विश्व हिन्दी सचिवालय की गतिविधियों का उल्लेख करते हुये अपने संबोधन में कहा कि "भविष्य में हिन्दी सेवी संस्थाओं के सहयोग से हम विश्व स्तर पर इस प्रकार के आयोजनों की शृंखला आयोजित करेंगे। इस पर काम चल रहा है और निकट भविष्य में क्रियान्वित होने की संभावना है। 

इस अवसर पर हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरीशस के प्रधान यन्तु देव बुद्धू ने हिन्दी प्रचारिणी सभा को हिन्दी सेवियों का तीर्थस्थल बताते हुये सभा की उपलब्धियों को रेखांकित किया और आगत अतिथियों का स्वागत करते हुये कहा कि "यह हमारा सौभाग्य है कि हम आज इस कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दी को वैश्विक फ़लक पर प्रतिष्ठापित करने हेतु एक संकल्पित प्रयास कर रहे हैं।" 

प्रतिनिधि मण्डल के नेतृत्वकर्ता और परिकल्पना के सस्थापक रवीन्द्र प्रभात ने कहा कि "हिन्दी की पढ़ाई आज विश्व के 130 विश्वविद्यालयों में होती है, किन्तु इस देश में मुझे एक अभाव खटक रहा है कि यहाँ राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का कोई दैनिक अखबार नहीं है। यदि ऐसा हो जाये तो हम हिन्दी को जन जन तक ले जाने में सफल हो सकते हैं। इससे हमारी नयी पीढ़ी को भी अपनी भाषा और संस्कृति आत्मसात करने में सुविधा होगी।" 

वैश्विक संदर्भ में हिन्दी विषय पर आयोजित विचार सभा में अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुये डॉ राम देव धुरंधर ने कहा कि "साहित्य की ऐसी कोई भी रचना नहीं होनी चाहिए जो दुनिया को बांटे, मानवता को बांटे। सद्भावना, प्रेम और मानवता का स्वर ही साहित्य की भाषा का लक्ष्य होना चाहिए। 
हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरीशस के मंत्री धनराज शंभू ने कहा कि "वैश्विक हिन्दी साहित्य में विश्व मानवता की परिकल्पना है, जिसे विदेशी विद्वानों ने भी अपनाया है। हिन्दी दुनिया के पाँच महाद्वीपों में व्याप्त है, जिसे पूरी दुनिया में एक नए आयाम पर ले जाने की आवश्यकता है।"


हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरीशस के कोषाध्यक्ष टहल रामदीन ने अपने भावपूर्ण उद्वोधन में कहा कि " हिन्दी हमारे रग-रग में है। हम हिन्दी के लिए जीते हैं और हिन्दी के लिए मरते भी हैं।"

इसके अलावा डॉ हेमराज सुंदर, डॉ मिथिलेश दीक्षित, डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ रमाकांत कुशवाहा, डॉ अर्चना श्रीवास्तव, श्रीमती कल्पना लाल जी ने भी विचार सभा को संबोधित किया। परिचर्चा सत्र का संचालन डॉ राम बहादुर मिश्र, कवि सम्मेलन का संचालन सागर त्रिपाठी तथा उदघाटन सत्र का संचालन धनराज शंभू और सुनीता प्रेम यादव ने किया। विषय परिवर्तन रवीन्द्र प्रभात ने किया। 

इस अवसर पर हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरीशस तथा परिकल्पना के द्वारा हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने
हेतु संकल्पित प्रयास करने पर बल दिया गया। 

दोनों देशों के राष्ट्रगान के साथ सभा की शुरुआत हुयी तथा अंत में मॉरीशस के दिवंगत साहित्यकार स्व. अभिमन्यु अनत को श्रद्धांजलि अर्पित कर सभा का समापन हुआ।

(मॉरीशस से डॉ राम बहादुर मिश्र की रपट)

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

हिंदी ब्लागिंग की 15वीं वर्षगाँठ पर....

आज हिंदी ब्लागिंग की 15वीं वर्षगाँठ है। वर्ष 2003 में यूनीकोड हिंदी में आया और तद्नुसार हिन्दी ब्लॉग का शुभारम्भ हुआ। पूर्णतया हिन्दी में ब्लॉगिंग आरंभ करने का श्रेय आलोक कुमार को जाता है, जिन्होंने 21 अप्रैल 2003 को हिंदी के प्रथम ब्लॉग ’नौ दो ग्यारह’ से इसका आगाज किया था। यहाँ तक कि ‘ब्लॉग‘ के लिए ‘चिट्ठा‘ शब्द भी उन्हीं का दिया हुआ है।

आलोक कुमार भारत के एक साफटवेयर इंजीनियर हैं। वे प्रथम हिन्‍दी ब्‍लॉगर्स के रूप में जाने जाते हैं। ब्‍लॉग को उसका हिन्‍दी नाम चिटठा देने का श्रेय उन्‍ही को जाता है। इसके अतिरिक्‍त उन्होंने एक ब्‍लॉग एग्रीगेटर चिटठाजगत डाॅट इन की भी शुरूआत की थी। तकनीकी कारणवश अब वो बन्‍द हो चुका है। आजकल वे अपने ब्‍लॉग देवनागरी डॉट इन पर तकनीकि ज्ञान देते हैं।

वर्ष-2003-2004 को हिंदी ब्लॉगिंग का पूर्वाध काल कहा जा सकता है । इन दोनों वर्षों में हिंदी ब्लॉगिंग का बहुत ज्यादा विकास नहीं हो पाया, हालांकि इस दौर के प्रमुख ब्लॉग हैं - इंदौर के देबाशीश का ब्लॉग नुक्ता चीनी,  रवि रतलामी का हिंदी ब्लॉग  ,पंकज नोरुल्लाशजर बोलता हैअक्षर ग्राम कुछ बतकहीफ़ुरसतिया , मेरी कविताएँ,  सिन्धियत,  मेरा पन्ना,  ठलुआ ,  शब्द साधना,  गुरु गोविन्द,  कटिंग चाय,  समथिंग टू से,  कुछ तो है जो कि  और   हाँ कबाजी आदि । आगे चलकर अमर कुमार जी के ब्लॉग कुछ तो है जो कि का सदस्य मैं भी बना । वर्ष -2005 में जब हिंदी चिट्ठों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई तब उस समय चिट्ठा चर्चा की शुरुआत हुई । वर्ष-2005 के उत्तरार्ध में हिंदी ब्लॉग की संख्या एन केन प्राकेण 100 हुई । हलांकि वर्ष-2005 में मनीष कुमार का Ek Shaam Mere Naam अस्तित्व में आ गया था, किन्तु यह रोमन में लिखा जा रहा था , वर्ष-2006 में मनीष कुमार एक शाम मेरे नाम से दूसरा ब्लॉग पुन: लेकर आये जिसमें उन्हीनें देवनागरी लिपि में सुन्दर संस्मरण प्रस्तुत किया। वर्ष-2006 में हिंदी चिट्ठों का व्यापक बिकास हुआ और उस दौरान उड़न तश्तरी ,इन्द्रधनुषअखंडआलोकपुष्टिमार्गप्रणव शर्माप्रशांतभास्करविनीतश्रवनसंतोषIIFMights का चिट्ठा , थोड़ा और , श्रीश , ई पंडित , नारद, परिचर्चा, हमारा बेंजीमाझी दुनिया , निशिकांत वर्ल्ड,  दीपांजलि , निरंतर तरकश के साथ-साथ अनेक महत्वपूर्ण ब्लॉग अवतरित हुए । वर्ष-2006 हिंदी चिट्ठों के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण अवश्य रहा किन्तु महत्वपूर्ण सामग्री परोसने के लिहाज से बहुत उपयोगी नहीं रहा। हिंदी चिट्ठों का व्यापक बिकास हुआ वर्ष- 2006 के दौरान,  हिन्दी चिट्ठों की संख्या दो हजार को पार कर गयी । वर्ष - 2007 में हिन्दी चिट्ठों की संख्या ज्यादा नहीं थी, लगभग तीन हजार के आसपास थी, इसीलिए ब्लॉग विश्लेषण के अंतर्गत परिकल्पना पर केवल साठ महत्वपूर्ण ब्लॉगस की हीं चर्चा की जा सकी थी। वर्ष-2008 आते आते ब्लॉगस की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ और यह संख्या दस हजार के आसपास पहुँच गयी । वर्ष -2008 में हिन्दी चिट्ठा जगत के लिए सबसे बड़ी बात यह रही कि इस दौरान अनेक सार्थक और विषयपरक ब्लॉग की शाब्दिक ताकत का अंदाजा हुआ।

वर्ष-2009 में हिन्दी चिट्ठों की संख्या लगभग 20,000, वर्ष-2010 में 30,000, वर्ष-2011 में 39,000 और वर्ष-2012 में यह संख्या 50,000 के आसपास पहुँच गयी। वर्ष- 2009 में संवाद सम्मान की शुरुआत हुयी और इसके बाद इसे जारी नहीं किया जा सका। हिन्दी साहित्य और ब्लॉगिंग के बीच सेतु निर्माण एवं उत्थान में अविस्मरणीय योगदान देने वाले हिन्दी चिट्ठाकारों को सम्मानित करने के उद्देश्य से मेरे तथा मेरे कुछ साथियों के द्वारा वर्ष-2010 में अंतर्जाल पर उत्सव की परिकल्पना की गयी। नाम दिया गया परिकल्पना ब्लॉगोत्सव। इसमें शामिल प्रतिभाशाली प्रत्येक वर्ष 51 सृजनधर्मियों का चुनाव करते हुये उन्हें परिकल्पना सम्मान दिये जाने की घोषणा की गयी। इसके अंतर्गत सम्मान धारकों को मोमेंटो, सम्मान पत्र, पुस्तकें, शॉल और एक निश्चित धनराशि के साथ सम्मानित करने की उद्घोषणा हुयी। इसके अंतर्गत अभी तक 500 चिट्ठाकारों को सम्मानित किया जा चुका है।


इस दौरान हिन्दी के कई एग्रीगेटर आए जैसे नारद, ब्लॉगवाणी, चिट्ठाजगत आदि आदि और काल कलवित भी हो गए, लेकिन वर्तमान में सक्रिय दो एग्रीगेटर क्रमश: हमारी वाणी और ब्लॉग सेतु की जीवटता को मेरी शुभकामनायें है। 

वर्ष-2014 और 2015 में हिन्दी चिट्ठों की संख्या में भरी गिरावट आई, कारण था फेसबूक का सर्वाधिक लोकप्रिय होना। वैसे तो फेसबूक का आरंभ 2004 में हार्वर्ड के एक छात्र मार्क ज़ुकेरबर्ग ने की थी, किन्तु इसकी अपार लोकप्रियता 2014-15 में हुयी और अनवरत जारी है।  आज भी ब्लॉग लिखा जा रहा है और हमारे कई साथी इसे ऊंचाई पर प्रतिष्ठापित करने की दिशा में सक्रिय हैं। 


वर्ष-2016-17 और 18 की बात की जाये तो यह दौर हिन्दी ब्लॉगिंग में सन्नाटों का दौर रहा लेकिन हिन्दी ब्लॉग आने का सिलसिला लगातार जारी है। सक्रिय और निष्क्रिय मिलाकर आज  हिन्दी चिट्ठों की संख्या लगभग 60,000 के आसपास है। 

हिन्दी ब्लॉगिंग की 15 वीं वर्षगांठ पर आप सभी को कोटिश: शुभकामनायें.... आइए आज उन सभी लोगों को याद करते हैं और उन्हें धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने हिंदी ब्लागिंग को इस मुकाम तक पहुँचाया... । 

जय हिन्दी ब्लॉगिंग। 


मंगलवार, 6 मार्च 2018

शव-साधना

शनिवार, 27 जनवरी 2018

बसंत आर्य की हास्य कविताओं की जारी विडियो 'बदकिस्मती' की पड़ताल....

हा गया है कि साहित्य की अमृतधारा हास्य और व्यंग्य से होकर ही गुजरती है। जहां हित की भावनाएं हिलकोरें मारती है, वहीं से प्रस्फुटित होती  है हास्य और व्यंग्य की एक अलग धारा जो पत्र-पत्रिकाओं के रास्तों से गुजरते हुये मंच पर श्रोताओं के बीच जाकर पूर्णता को प्राप्त करती है। कलुषित परिवेश की कालिमा जलाकर उसके बदले एक खुशहाली से भरे विहान को जन्म देती है। गुदगुदाती है, हँसाती है, लोटने को मजबूर करती है, चाहे पेट में बल ही क्यों न पड़ जाये। यानि हँसाते- हँसाते रुला देना और रोते हुये को हंसने के लिए मजबूर कर देना, सही मायनों में यही विशुद्ध हास्य और व्यंग्य की कसौटी मानी जाती है। हिन्दी में लिखंत और पढ़ंत यानि वाचिक परंपरा साथ-साथ चलती रही है, जो हिन्दी साहित्य की एक बड़ी विशेषता मानी जा सकती है।

आज के दौर में तो अनेक हास्य-व्यंग्य कवि है। गाँव-घर-चौपाल कहीं भी मिल जाएँगे, कुछ सतही तो कुछ स्तरीय कवि के रूप में। मगर कुछ ही हैं जो अपनी छाप छोड़ने में सफल होते हैं। ऐसे ही एक हास्य कवि हैं मेरे मित्र बसंत आर्य जो सीतामढ़ी, बिहार से ताल्लुक रखते हैं। आजकल मुंबई में रहते हैं। मंचों पर उनकी सार्थक उपस्थिति देखी जा सकती है।

मेरे प्रिय हास्य-व्यंग्य कवियों में से एक हैं बसंत, जिनकी कवितायें कहीं आग बोती नज़र आती है तो कहीं आग काटती। ऐसी आग जो आँखों के जाले काटकर पुतलियों को नई दिशा देती है, अंधेरा काटकर सूरज दिखाती है, हिमालय गलाकर वह गंगा प्रवाहित करती है जिससे सबका कल्याण हो। इनकी कवितायें रुलाती नहीं हँसाती है, सुलाती नहीं जगाती है, मारती नहीं जिलाती है। सचमुच शाश्वत एवं चिरंतन है बसंत की  कविता।

बसंत हिन्दी के एक ब्लॉगर भी हैं, जिनके ब्लॉग का नाम है ठहाका । 

आज ही इनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं की प्रस्तुति सहित एक वीडियो जारी हुआ है। आप स्वयं सुनेंगे तो वाह-वाह करने पर मजबूर हो जाएँगे-



गुनाहो का गीत

 
Top