हा गया है कि साहित्य की अमृतधारा हास्य और व्यंग्य से होकर ही गुजरती है। जहां हित की भावनाएं हिलकोरें मारती है, वहीं से प्रस्फुटित होती  है हास्य और व्यंग्य की एक अलग धारा जो पत्र-पत्रिकाओं के रास्तों से गुजरते हुये मंच पर श्रोताओं के बीच जाकर पूर्णता को प्राप्त करती है। कलुषित परिवेश की कालिमा जलाकर उसके बदले एक खुशहाली से भरे विहान को जन्म देती है। गुदगुदाती है, हँसाती है, लोटने को मजबूर करती है, चाहे पेट में बल ही क्यों न पड़ जाये। यानि हँसाते- हँसाते रुला देना और रोते हुये को हंसने के लिए मजबूर कर देना, सही मायनों में यही विशुद्ध हास्य और व्यंग्य की कसौटी मानी जाती है। हिन्दी में लिखंत और पढ़ंत यानि वाचिक परंपरा साथ-साथ चलती रही है, जो हिन्दी साहित्य की एक बड़ी विशेषता मानी जा सकती है।

आज के दौर में तो अनेक हास्य-व्यंग्य कवि है। गाँव-घर-चौपाल कहीं भी मिल जाएँगे, कुछ सतही तो कुछ स्तरीय कवि के रूप में। मगर कुछ ही हैं जो अपनी छाप छोड़ने में सफल होते हैं। ऐसे ही एक हास्य कवि हैं मेरे मित्र बसंत आर्य जो सीतामढ़ी, बिहार से ताल्लुक रखते हैं। आजकल मुंबई में रहते हैं। मंचों पर उनकी सार्थक उपस्थिति देखी जा सकती है।

मेरे प्रिय हास्य-व्यंग्य कवियों में से एक हैं बसंत, जिनकी कवितायें कहीं आग बोती नज़र आती है तो कहीं आग काटती। ऐसी आग जो आँखों के जाले काटकर पुतलियों को नई दिशा देती है, अंधेरा काटकर सूरज दिखाती है, हिमालय गलाकर वह गंगा प्रवाहित करती है जिससे सबका कल्याण हो। इनकी कवितायें रुलाती नहीं हँसाती है, सुलाती नहीं जगाती है, मारती नहीं जिलाती है। सचमुच शाश्वत एवं चिरंतन है बसंत की  कविता।

बसंत हिन्दी के एक ब्लॉगर भी हैं, जिनके ब्लॉग का नाम है ठहाका । 

आज ही इनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं की प्रस्तुति सहित एक वीडियो जारी हुआ है। आप स्वयं सुनेंगे तो वाह-वाह करने पर मजबूर हो जाएँगे-



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