शीर्षक पढ़कर चौंक गए होंगे आप ? चौंकिए मत, यह सच्चाई है। यह विगत 27 अगस्त को लखनऊ में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन एवं परिकल्पना सम्मान कार्यक्रम की सफलता से चिढ़े दो ऐसे ब्लॉगरों की दास्तान है, जिन्होनें कार्यक्रम के पश्चात उपदेश टनभर दिया, किन्तु ग्रहण कणभर भी नहीं किया
। पहले ब्लॉगर हैं
महेंद्र श्रीवास्तव जी, जिन्होंने
अपने मन की भड़ास निकालने के लिए निर्लज्जता और बेशर्मी की सारी सीमाएं पार गए । जो इनके विरोध में टिप्पणियाँ थी उसे मोडरेशन के नाम पर इन्होने डिलीट कर दिया औए बेनामी टिप्पणियों को प्रकाशित कर निर्लज्जता का परिचय देते रहे। एक उदाहरण देखिये -
आश्चर्य का विषय है कि अपने मन की भड़ास निकालने के लिए लोग कितने निर्लज्ज और बेशर्म हो जाते हैं।
जहां तक डॉ रूप चन्द्र शास्त्री जी की बात है, तो उनका मैं बहुत सम्मान करता हूँ। वे अकेले ऐसे ब्लोगर/रचनाकार हैं जिन्हें परिकल्पना समूह ने लगातार दो बार सम्मानित करके गर्व महसूस किया है।संभव है किसी ने इन्हें उकसाया हो, क्योंकि लोगों को अवसर मिल गया तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का।
सत्यता यह है कि अंतिम सत्र के दौरान बीच में ही 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान ' लोगों को दिये गये ! उस सत्र का संचालन एक ऐसे व्यक्ति कर रहे थे, जो ब्लॉग जगत से परिचित नहीं थे ! सम्मान समारोह के ठीक पहले उन लोगों के नाम अलग कर लिये गये थे, जो वहां पर मौजूद नहीं थे, उसी में त्रुटिवश शास्त्री जी का, नीरज जाट का और एक अन्य ब्लॉगर के सर्टिफिकेट भी उस लिस्ट मे चले गए थे , जो लोग वहाँ उपस्थित नहीं थे । हालांकि शास्त्री जी सामने की पहली पंक्ति मे बैठे थे , लेकिन जब व्यक्ति इतना बड़ा आयोजन कर रहा हो तो उसका दिमाग तमाम तरह की व्यवस्थाओं में गडड—मड्ड हो ही जाता है ।
हम लोग अपने घर में चार मेहमान बुला लें, तो उसमें भी तमाम तरह की अव्यवस्थाएं होने लगती हैं। नि:संदेह यह एक त्रुटि थी , जिसके लिए मैंने तत्क्षण मंच से खेद व्यक्त किया था । इसलिए शास्त्री का रूष्ट होना समझ में नहीं आता है।
इसके साथ ही साथ उन्होंने अपनी पोस्ट में 'ब्लॉग दशक सम्मान' और 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान' के सार्टिफिकेट लगाकर यह जताने की कोशिश की, मेरा नाम मूल लिस्ट में नहीं था, उसे उसी समय बनाया गया। इस विषय पर मैं इतना ही कहूंगा कि ऐसा भ्रम उन्हें इसलिए हुआ क्योंकि ब्लॉग दशक में एक श्रेणी के सिर्फ 5 सम्मान थे, इसलिए उनको डिजाइन कराते समय सभी में प्राप्तकर्ताओं के नाम सीधे प्रिंट करवा दिये गए थे।
पर चूंकि 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान' एक साथ 51 लोगों को दिये जाने थे, इसलिए वे बनवाए ही इस तरह से गये थे कि एक डिजाइन के प्रिंट निकलवा कर सभी लोगों के नाम अलग—अलग भर लिये जाएं। शायद इसीलिए शास्त्री जी को यह भ्रम हुआ कि उनके नाम का सार्टिफिकेट वहीं पर भरा गया। जबकि इस सम्बंध में इस भ्रम का निवारण पाबला जी और कुंवर कुशुमेश जी कर चुके हैं, फिरभी इसे बढा चढा कर प्रस्तुत किया गया, जोकि किसी भी नजिरए से न तो स्वस्थ नजरिया है और न ही नैतिकता, जिसकी इस पूरी पोस्ट में दुहाई दी गयी है।
इसके साथ ही साथ महेन्द्र जी का यह कहना सर्वथा असत्य है "जिसे आपने वहां सम्मान के लिए बुलाया है और वो आदमी वहां मौजूद है। आप कार्यक्रम के समापन का ऐलान कर देते हैं और उन्हें सम्मान के लिए बुलाते तक नहीं है।"
यह बात कहकर उन्होंने सर्वथा असत्य और मनगढंत बात को प्रचारित करके अपनी नकारात्मक छवि का ही प्रदर्शन किया हैं, क्योंकि सम्मान समारोह में जिन तीन लोगों के नाम छूट गये थे, उन्हें कार्यक्रम समाप्त होने के आधा घण्टा पहले ही बुला कर सम्मान पत्र दे दिये गये थे। यह बात हॉल में मौजूद 200 से अधिक ब्लॉगर्स से भी पूछी जा सकती है।
इससे भी स्पष्ट होता है कि ये अपनी भडास निकालने के लिए सर्वथा असत्य बातों का मिथ्या प्रचार करते हैं और दूसरों का अपमान करने से गुरेज नहीं रखते । इन्हें ध्यान में रखना चाहिए की इस तरह की बातें 'मानहानि' के दायरे में भी आ सकती हैं।
महेन्द्र जी, दूसरों के सम्मान की इतनी चिंता है, पर अपने उस अपमान पर भी ध्यान दीजिए, जो आपने सिर्फ अपनी खुन्नस निकालने के लिए और दूसरों की नजरों में 'हीरो' बनने के लिए किया हैं। स्वयं तो बेनामी के रूप में एवं पूर्णत: आधारहीन बातों को पब्लिकली कहते रहे और उपर से उसके जवाब में आने वाले कमेंटों पर मॉडरेशन लगाए रहे।
जहां तक शिखा जी के मंच पर बैठने की बात है, यह किस किताब में लिखा है कि युवा और प्रतिभा सम्पन्न लोगों को सम्मान देना बुजुर्ग लोगों का अपमान ही होता है। अगर आप ऐसा मानते हैं, तो जरूरत इस बात की है कि आप अपनी सोच का परिष्कार करिए, फिर दूसरे के मान और सम्मान की बात करिए।
जहां तक उम्र की बात है, मेरे विचार में उम्र का विद्वता से कोई सम्बंध नहीं होता। अगर उम्र ही विद्वता का पैमाना होती, तो आज हिमायल के पहाड़ संसार के सबसे आदरणीय और सम्माननीय होते।
शिखा जी की आड लेकर आपने न सिर्फ उनकी मेधा का अपमान किया हैं, वरन शातिराना तरीके से ब्लॉग जगत का माहौल भी खराब किया हैं। यह कार्य निहायत ही अशोभनीय एवं निंदनीय है।
इन्होनें अपने पोस्ट में कहा है कि 'मैं इसके तरीके के खिलाफ पहले भी था और आज भी हूं।'
अच्छा तो यह तो इन्होनें बताया ही नहीं कि ये किस तरह के आयोजन के समर्थन में हैं। क्या इन्होनें इस तरह का आयोजन कभी किया है, अगर नहीं, तो कहीं देखा, सुना तो होगा, तो उसका पता बता दीजिए! मैं व्यक्तिगत रूप से अपने सहयोगियों के साथ अगला आयोजन करने से पहले उस आइडियल आयोजन को जाकर देख आऊँगा ।
और अगर ऐसा कोई आयोजन अभी तक हुआ नहीं है, तो इनकी सोच वास्तव में कोई दिव्य टाइप के आयोजन को लेकर बनी हुई लगती है! ऐसे में इनसे विनम्र निवेदन है कि कृपया उस दिव्य आयोजन को आयोजित करके सम्पूर्ण विश्व के ब्लॉगरों को उपकृत कर दीजिए। यह आपका ब्लॉग जगत पर बहुत बडा एहसान होगा।
इन्होने अपने पोस्ट में ये भी कहा है कि 'ये मेरी गलती है कि मैं ज्यादा लोगों को पहचानता नहीं। अगर ऐसा है तो सभी उसमें बराबर के दोषी है।'
वाह, क्या बात कही है महेन्द्र जी ने। मंच पर मौजूद लोगों के बारे में जानते तक नहीं, और सवाल उठाने लगे आयोजकों के मंतव्य पर। इससे यह स्वयं स्पष्ट हो जाता है कि ब्लॉग जगत के बारे में इनका ज्ञान कितना विशद है। इसके साथ ही साथ इससे यह भी प्रतिध्वनित होता है कि इनकी मंशा वास्तव में क्या है।
दरअसल, इनका काम किसी भी काम के बारे में उंगली उठा कर स्वयं को चर्चा में लाना था और यही काम ये शुरू से कर रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए ये आलोचना का पहला नियम ही भूल गये कि जिस चीज की ए बी सी डी नहीं जानते, वहां पर अपना ज्ञान/दर्शन नहीं बघारना चाहिए। इसी को लेकर अवध प्रांत में एक कहावत भी प्रचलित है: 'बीछी का मंतर न जानै, सांप के बिल मा हाथ घुसेरै।'
आशा है ब्लॉग जगत के विद्वत लोग इनकी अंजाने में हुई इस आत्मस्वीकृति से इस पोस्ट के असली मंत्वय तक पहुंच जाएंगे।
कुंठा को कितना भी छिपा कर क्यों न रखा जाए, वह कहीं न कहीं से दरक ही जाती है। इनका यह कमेंट इस बात का गवाह है कि इनकी मंशा क्या है।
अरे, आम का पेड़ लगा या बबूल का, पेड तो है। क्या उपयोगी सिर्फ आम होता है, बबूल नहीं ?
मुददे की बात यह नहीं कि पेड आम का है या बबूल का। मुददा यह है कि पेड लगा या नहीं। और ये, इन्होनें तो सिर्फ लगे हुए पेड को उखाडने का असफल प्रयत्न किया है
।
कार्यक्रम हो चुका, इतिहास बन चुका, इनके या किसी के उसपर थूकने से वह इतिहास नहीं मिट सकता। उस इतिहास को उखाडने से अच्छा है कि ये उससे बेहतर इतिहास बनाकर दिखाएँ । दूसरे के बबूल के पेड को उखाडने से बेहतर है, बबूल ही सही, एक पेड तो लगाकर दिखाएँ !
महेन्द्र श्रीवास्तव जी का शास्त्री जी को कही गयी उस बात का जवाब कि सार्टिफिकेट पर जिन लोगों के साइन हैं, वे इस योग्य नहीं हैं
। अब अपने बारे में अगर कुछ भी कहूंगा तो यह अपने मुंह मियां मिटठू हो जाएगा, लेकिन सम्मान पत्र पर मेरे साथ जाकिर भाई के भी हस्ताक्षर थे और उनके बारे में इस तरह के विचार इनकी अज्ञानता को दर्शाते हैं। शायद इन्हें नहीं मालूम उन्होंने अभी तक तीन-तीन शोध कार्य किये हैं, उनकी 65 पुस्तकें प्रकाशित हैं, भारत सरकार, उत्तपर प्रदेश सरकार सहित, इंडिया टुडे, सहारा समय, अभिव्यक्ति जैसी संस्था एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं में उन्हें पुरूस्कृत कर चुकी हैं और बाल कहानी, विज्ञान कथा के साथ-साथ विज्ञान लेखन एवं विज्ञान संचार के क्षेत्र में उनका नाम मील का पत्थर है। इतनी कम उम्र में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वह आश्चर्यचकित करने वाली हैं। उनके नाम पर उंगली उठाना आपकी अज्ञानता और दिबालियेपन की निशानी है।
ब्लैक डे के जवाब में: परिकल्पना सम्मान को श्री रवि रतलामी, पूर्णिमा वर्मन जैसी हस्तियों ने स्वीकार कर उसका गौरव बढ़ाया है। इससे यह सम्मान स्वयं सम्मानित हो गया है। ऐसे में इनके द्वारा इस सम्मान पर उंगली उठाना और इसे ब्लैकक डे कहना स्वयं अपने मुंह पर कालिख पोतने के समान है। क्योंकि ऐसा करके ये उपरोक्त हस्तियों के ऊपर भी लांछन लगा रहे हैं, जो निहायत ही निंदनीय है। इसी के साथ जिन लोगों ने इनके सुर में सुर मिलाया है, मेरे विचार में उन लोगों ने भी इन हस्तियों का अपमान किया है। ऐसे लोग न तो ब्लॉगजगत के हितैषी हो सकते हैं और न ही सच्चे् ब्लॉगर।
महेंद्र जी, आपके पोस्ट में शिवम् मिश्र के द्वारा की गयी इस टिपण्णी का मैं समर्थन करता हूँ कि "आपका यह तर्क तर्क कम कुतर्क ज्यादा लगा ... माफ कीजिएगा !"

अब आईये दूसरे आलोचक ब्लोगर की सच्चाई से अवगत होते हैं। नाम है पवन मिश्र । जब इनके
पोस्ट लिखने के पीछे की सच्चाई मुझे जाकिर भाई से पता चली तो मुझे बहुत हंसी आई । जाकिर भाई ने बताया कि इन्होनें एकबार एक कार्यक्रम की पोल खोल चर्चा की थी ।
कानपुर यूनिवर्सिटी मे नकल और उडनदस्ते का पर्दाफाश इन्होनें कानपुर ब्लोगर असोसिएशन के थ्रू किया था , इसलिए जांच कमिटी बैठ गयी । उन्होंने जाकिर भाई से बोला की परिकल्पना वाले कार्यक्रम में मेरी इस बहादुरी के चर्चे करवा दो । जिस पोस्ट की ये चर्चा करवाना चाह रहे थे उसके लिंक हैं :
http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_16.html
http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_4956.html
http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_09.html
प्रोग्राम के अगले दिन दोपहर में पवन मिश्र ने जाकिर भाई से फेसबुक पर चैट के दौरान सबसे पहले यही पूछा कि सम्मेलन में इस घटना की चर्चा हुई ? जब जाकिर भाई ने मना कर दिया, तो वो फ़ुरसतिया और अन्य लोगों के बारे में सवाल पूछने लगे। उस समय जाकिर आफिस में थे और किसी जरूरी काम में बिजी थे, इसलिए बातों को टाल गये। इससे पवन मिश्र का ईगो हर्ट हो गया और अगले ही दिन अपनी भड़ास निकालने के लिए पोस्ट लगा दी।
मैं यहाँ फिर यही बात कहूंगा कि, अपने मन की भड़ास निकालने के लिए निर्लज्जता और बेशर्मी से बाहर निकलकर कुछ सार्थक सोचिये, सार्थक करिए और सार्थक दिशा में आगे बढिए ।
अंत में अविनाश वाचस्पति जी के इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूँ , कि "जब हमाम में झांकने का शौक है तो सब नंगे ही नजर आएंगे, इसमें अजीब सी कोई बात नहीं है।"