अनुज लुगुन
(भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार से सम्मानित)

एकलव्य की कथा सुनकर मैं हमेशा इस उधेड़बुन में रहा हूँ कि द्रोण को अपना अँगूठा दान करने के बाद उसकी तीरंदाजी कहाँ गई ? क्या वह उसी तरह का तीरंदाज बना रहा या उसने तीरंदाजी ही छोड़ दी ? उसकी परंपरा का विकास आगे कहीं होता है या नहीं ? इसके आगे की कथा का जिक्र मैंने कहीं नहीं सुना। लेकिन अब जब कुछ-कुछ समझने लगा हूँ तो महसूस करता हूँ कि रगों में संचरित कला किसी दुर्घटना के बाद एकबारगी समाप्त नहीं हो जाती। हो सकता है एकलव्य ने अपना अँगूठा दान करने के बाद तर्जनी और मध्यमिका अँगुलियों के सहारे तीरंदाजी का अभ्यास किया हो। क्योंकि मुझे ऐसा ही प्रमाण उड़ीसा के सीमावर्ती झारखंड के सिमडेगा जिले के मुंडा आदिवासियों में दिखाई देता है। इस संबंध में मैं स्वयं प्रमाण हूँ। (हो सकता है ऐसा हुनर अन्य क्षेत्र के आदिवासियों के पास भी हो) यहाँ के मुंडा आदिवासी अँगूठे का प्रयोग किए बिना तर्जनी और मध्यमिका अँगुली के बीच तीर को कमान में फँसाकर तीरंदाजी करते हैं। रही बात इनके निशाने की तो इस पर सवाल उठाना मूर्खता होगी। तीर से जंगली जानवरों के शिकार की कथा आम है। मेरे परदादा , पिताजी , भैया यहाँ तक कि मैंने भी इसी तरीके से तीरंदाजी की है। मेरे लिए यह एकलव्य की खोज है और यह कविता इस तरह एकलव्य से एक संवाद।
और उस पार की कौतुहूलता में
तेज प्रवाह के समक्ष अक्षम,
उस अनाम नदी की लहरों के साथ
जो कभी लहरों के स्पर्श से झूमती
जंगली शाखों की तरह झूम उठता था
तो कभी बाढ़ में पस्त वृक्षों की तरह सुस्त होता था
पर पानी के उतर जाने के बाद
मजबूती से फिर खड़ा हो जाता था
और घने जंगल में सूखे पत्तों पर हुई
तुमने देख लिया था मदरा मुंडा
और हवा के गुजर जाने के बाद
पत्तों की पुनः स्थिति से पहले ही
'जोवार सिकारी बोंगा जोवार!'
हँड़िया का रस तैयार करते हुए
आज भी गाती हैं तुम्हारे स्वागत में गीत
"सेंदेरा कोड़ा को कपि जिलिब-जिलिबा।"
तब भी तुम्हारे हाथों धनुष
रक्सा, डायन और चुड़ैलों के किस्सों के साथ
खेत की रखवाली करते कांडे हड़म
तुमने जंगल की नीरवता को झंकरित करते नुगुरों के
चर्र-चर्र-चर्र की समूह ध्वनि की
अनुमान का सटीक तीर छोड़ा था
और सागर में अति लघु भूखंड की तरह
जो बरहे की छाती में जा धँसा था।
तब भी तुम्हारे हाथों छुटा तीर
सैकड़ों तीरों ने आग उगली थी
और हाड़-माँस का छरहरा बदन बिरसा
अपने स्वशासन का झंडा लहराया था।
जैसे तुम तीर चलाते रहे होगे
द्रोण को अपना अँगूठा दान करने के बाद
तर्जनी और मध्यमिका के बीच
एकलव्य मैं तुम्हें नहीं जानता
न मैं जानता हूँ तुम्हारा कुर्सीनामा
और न ही तुम्हारा नाम अंकित है
मेरे गाँव की पत्थल गड़ी पर
अपने परदादा तक पहुँच जाता हूँ।
लेकिन एकलव्य मैंने तुम्हें देखा है।
अपने परदादा और दादा की तीरंदाजी में
भाई और पिता की तीरंदाजी में
अपनी माँ और बहनों की तीरंदाजी में
हाँ एकलव्य ! मैंने तुम्हें देखा है
जहाँ महाभारत में तुम्हारी कथा समाप्त होती है।
एकलव्य मैंने तुम्हें देखा है
एकलव्य मुझे आगे की कथा मालूम नहीं
केवल अपनी तीरंदाजी के प्रदर्शन के लिए
गुरू द्रोण और अर्जुन के बीच
या फिर तुम्हारे पदचिह्न भी खो गए
जहर-बुझे तीर से रक्त-रंजित
एकलव्य, काश ! तुम आए होते
महाभारत के युद्ध में अपने हुनर के साथ
तब मैं विश्वास के साथ कह सकता था
दादाजी ने तुमसे ही सीखा था तीरंदाजी का हुनर
हाँ, किसी द्रोण को अपना गुरु न मानना
हिरण, बरहा और वृक्षों के छाल
किसी भी कुत्ते के मुँह में
उसकी जुबान बंद कर सकती है।