नज़ाकत, नफासत और तमद्दुन का शहर लखनऊ यानी तहजीव-ए-अवध के मुताबिक यह सर्वविदित है कि "मेहमां जो हमारा होता है वो जान से प्यारा होता है....." कल यानी 13 सितंबर को मेरे पास इंडोनेशियन एम्बेसी से दूरभाष पर यह सूचना मिली कि इंडोनेशियन संस्कृतिकर्मियों का एक दल मिस्टर इकसन के नेतृत्व में आपके शहर में तशरीफ ला रहें हैं ......" 



यह सुनकर बहुत खुशी हुयी लेकिन मैं पहले से डॉ अनीता श्रीवास्तव जी के अनुरोध को स्वीकार कर पुस्तक मेले में आयोजित कवि गोष्ठी मे जाने के लिए तैयार था। फिर मैंने उन आगंतुकों के स्वागत और सम्मान हेतु परिकल्पना के प्रवक्ता डॉ उदय प्रताप सिंह को इसका उत्तरदायित्व सौंपा। 




यह जानकार खुशी हुयी कि यह दल हमारे प्रतिनिधि से मिलकर अत्यंत अभिभूत हुये और आगामी जनवरी में इन्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में परिकल्पना के भारतीय दल को इन्डोनेशिया की धरती पर भव्य स्वागत करने की बात कही। दल के सभी सदस्यों का बहुत-बहुत स्वागत, वंदन और अभिनंदन।

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

 
Top