विगत 27 अगस्त को परिकल्पना ने अपना दूसरा ब्लॉग उत्सव अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन के रूप में मनाया । विगत वर्ष यह कार्यक्रम नयी दिल्ली में 30 अप्रैल को हुआ था । जब-जब ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रम होते हैं पक्ष और विपक्ष में स्वर तो उठते हीं हैं, उठने भी चाहिए किन्तु मर्यादा में उठे तो उसका सौन्दर्य बचा रहता है ।
कार्यक्रम के बाद ब्लॉग पर कई लोगों की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली, कई लोगों ने मुद्दे अच्छे उठाए जैसे
रवि रतलामी जी ने कहा "जिनके चेहरों से परिचित हैं उनके ब्लॉग से परिचित नहीं .. काश एक परिचय सत्र होता !"
मैं भी मानता हूँ कि भोजनोपरांत यदि 'परिचय सत्र' होता तो सबको सबसे परिचय मिल जाता। 'परिचय सत्र ' की मांग उचित ही है। आगे के कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान रखा जाएगा रवि जी।
दिनेश राय द्विवेदी जी ने कहा " इतने सम्मानों वाला सम्मेलन तीन दिन का होना चाहिए। सुबह शाम का वक्त कहीं घूमने घुमाने का भी होना चाहिए। कुछ अनौपचारिक सत्र भी होने चाहिए, सभागार के बाहर लॉन में चाय-पान-भोजन की व्यवस्था हो और उस के लिए एक-दो घंटे इंतजार करना पड़े। तब गप्प लड़ाई जाए। " यह सुझाव भी सारगर्भित है, आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यदि संसाधन की न्यूनता नहीं रही, तो आपके सुझाव पर गौर किया जा सकता है ।
हिन्दी ब्लॉगिंग से आठ साल से भी अधिक समय से जुड़े होने वाले एक
फुरसतिया ब्लॉगर ने भी यह माना, कि "खूब शानदार कार्यक्रम हुआ। आयोजकों ने खूब मेहनत की। तमाम घोषणायें हुईं। लोग एक दूसरे से मिले मिलाये। खूब सारी यादें समेटे हुये लोग अपने-अपने स्थान को गम्यमान हुये। हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में एक सुनहरा पन्ना जुड़ गया। " शुक्रिया ।
लेकिन उन्होने प्रेमचंद के उस वयान को भी अंकित किया कि “क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे” ? क्यों नहीं कहोगे भाई, कहो जी खोलकर कहो । हमारी एक फितरत से तो आप वाकिफ हो ही कि सम्मान करना मेरे फितरत में शामिल है । दूसरी भी फितरत जान लो कि हम सुनना भी जानते हैं, करना भी जानते हैं और अंतत: विजयी होना भी....।
अरुण चन्द्र राय और कुश्वंश ने यह सवाल किया था, कि रश्मि प्रभा जी आख़िरकार क्यों नहीं आयीं कार्यक्रम में, लीजिये उन्हीं से सुन लीजिये :
यह देखकर दुख होता है कि हमारा यह ब्लोगजगत एक अ -सहिष्णु क्लेशवादी समाज बनता जा रहा हैं । किसी की ख़ुशी देख के हम नांच नहीं सकते, तो कम से कम आँगन को तो टेढा बताने की सुविधा न लिया जाय । मुझे लगता है कि हममें- आपमें आत्म विश्लेषण या अंतर्निरीक्षण करने का साहस नहीं रहा, यही कारण है कि हम-आप अपने मन के उन दर्रों मे झांक नहीं पा रहे हैं जो अन्यथा हममें-आपमें छुपी हुयी है । अपनी असफलताओं से बौखलाकर दूसरों के प्रति दुराग्रह का भाव अंतत: स्वयं के नुकसान का हीं कारण बनता है । कार्यक्रम में क्या कमियाँ रही, आगे कैसे दुरुस्त किया जाये ....आदि-आदि विषयों पर मैं तो आत्म विश्लेषण कर रहा हूँ और यह भी महसूस कर रहा हूँ कि आपके दुराग्रह में स्वयं का ज्यादा और दूसरों का सम्मान नगण्य है । यह सर्व विदित है कि अनेक व्यक्ति अपनी भूलों की तो उपेक्षा करते रहते हैं लेकिन दूसरे व्यक्तियों के कार्यों की जांच बड़ी कटुता से करते हैं । हमें इस दृष्टिकोण को पलटकर दूसरों की त्रुटियों को क्षमा करके अपनी त्रुटियों की कठोरता पूर्वक जांच करनी चाहिए ।
कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं जिससे हमारी आतंरिक उर्जा में बढ़ोत्तरी हुयी, आभार सहित रख रहा हूँ :
जिन्होंने मुझे हिम्मत दी, उनका शुक्रिया :
नमस्कार ,,आदाब,,
जब से मैं सम्मेलन से वापस आई हूँ लेखों की भरमार दिखाई दे रही है ब्लॉग्स पर ,,हर कोई अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार लिख रहा है जहाँ अभद्र भाषा तक का प्रयोग हो रहा है ,,ख़ैर आयोजन कितना सफल था ,या उसके positive and negative points क्या क्या थे इन पर यदि आप लोग चाहेंगे तो फिर कभी चर्चा होगी लेकिन इस समय ये मेल मैं केवल इसलिये कर रही हँ कि आप लोग इन बातों से विचलित न हों हर आयोजन में कुछ कमियाँ रह जाती हैं जिन्हें अगले कार्यक्रम में सुधार लिया जाता है ,,आप लोगों ने मेहनत कर के इतना बड़ा कार्यक्रम किया उस के लिये आप लोग मुबारकबाद के अधिकारी हैं ,, हम लोग निर्मम आलोचना करने में ज़रा भी नहीं चूकते लेकिन जब स्वयं को ऐसा कुछ करना पड़े तब समस्याओं का भान हो पाता है ....मेरी ओर से आप की टीम बधाई की हक़दार है ! मनुष्य सदैव सीखता रहता है ,,आप लोगों ने इतना बड़ा कार्यक्रम करने की हिम्मत की यही बात बहुत बड़ी है ,,लोगों की बातों पर ध्यान न दें !
सादर
इस्मत जैदी
प्रिय रवींद्र प्रभात जी ,
परिकल्पना ब्लोगोत्सव की सर्वत्र आनंदमयी चर्चा है . आपकी प्रतिभा और कार्यशीलता के आगे मैं नतमस्तक हूँ . इस ऐतिहासिक सफलता के लिए आपको और आपके सहयोगियों को नाना बधाईयाँ और शुभ कामनाएँ . आपको अपने ज़ेहन में रख कर मैंने ग़ज़ल का मतला कहा है -
तुम्हारे जोश को ही देख कर महसूस करता हूँ
कि जैसे मुश्किलों की खाई से मैं भी उबरता हूँ !
प्राण शर्मा
प्रिय रवीन्द्र प्रभात जी,
इतिहास बनाने वाले ब्लोगर अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन की सफलता की कहानी जानने के लिए बेहद उत्सुकता थी |आशा के अनुकूल ही सूरजमुखी सुबह और मोरपंखी शाम के मध्य यह आयोजन सम्पन्न हुआ जिसकी चर्चा की खुशबू का दूर -दूर तक अंत नहीं |समस्त आयोजकों व इसमें शामिल होने वालों को पुन :बधाई |
सुधा भार्गव
डॉ अरविन्द मिश्र के अनुसार :
अब परिकल्पना सम्मान की सूची पर आप नज़र डालें तो यह आपको भान हो जाएगा कि ये सारे सम्मानित लोग तो ब्लॉगर ही हैं अपनी बिरादरी के ही हैं ..फिर इतना क्षोभ ,इतनी पीड़ा आखिर क्यों ? इससे तो यही लगता है कि खुद का निगलेक्ट होना ही लोगों को कचोट रहा है ..
रवि रतलामी जी ने ब्लोगोत्सव-2010 में एक साक्षात्कार के दौरान परिकल्पना सम्मान को कहा हिन्दी ब्लागिंग का आस्कर, क्योंकि इसके अंतर्गत व्यक्ति नहीं कई वर्गों में समूह सम्मानित होता है ...आपका आभार रवि जी ...!
और काजल कुमार जी का यह कार्टून भी अच्छा रहा, आलोचनाओं का तनाव कम कर गया, आभार काजल जी .
और अंत में :

ऐसे कई लोगों की प्रतिक्रियायों की चर्चा करना मुनासिब नहीं, जिन्होंने वैचारिक सुझाव न देकर व्यक्तिगत और दुराग्रही हमले किये हैं . जिन्होंने तीखी और गन्दी प्रतिक्रियाएं की है, उनसे केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि-
हम चाहें न चाहें पर किसी न किसी भाव में हम अपनी पहचान बता जाते हैं, जिसकी जीतनी समझ थी उसने वैसा कृत्य किया, हमारा क्या -
" हम तो दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ से जायेंगे वह रास्ता हो जाएगा ।"
परिकल्पना ब्लॉग उत्सव का ये कारवां बढ़ चला है। फिर होगा उत्सव, इससे भी बड़ा, इससे भी भव्य ......पहली बार दिल्ली में हुआ, दूसरी बार लखनऊ में और तीसरी बार .....? कयास लगाएं, मिलता हूँ एक विराम के बाद !