एक निःशब्द क्रंदन बतर्ज़.. चल उड़ जा रे पंछी बहुत ज़द्दोज़हद के बाद यह तय पाया गया कि , अब यहाँ से चलना चाहिये । मेरी एक मनपसंद कविता है...
डा.अमर कुमार
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