सच के रूप अलग अलग होते हैं , रख दो खुलकर तो कई एहसास थरथरा उठते हैं .... माँ, तुलसी के गले का रोआं सिहरता है क्या...! मां जब तुम थोड़ा डर...
तेइसवां दिन
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कवि बच्चन की पंक्तियाँ और उसे छूकर उभरते ख्याल ...
कवि बच्चन की पंक्तियाँ और उसे छूकर उभरते ख्याल ...
पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्घ्य न कर में, पर प्याला बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाए...
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