वह ही युवा है
भेद कर दुर्भेद्य धर्मावरण,
जो दे सके इंसानियत का सुबूत
वह ही युवा है।।
जब मान्यतायें रूढ़ियों में बदल जायें,
कभी की काल-सम्मत प्रथाएं
बदलते वक्त में अजगर सी जकड़ जायें,
क्षण-क्षण बदलते वक्त की आवाज
गुज़रे वक्त की खांसियों में दब जायें,
जो सिरे से इनको नकारे और करदे
इक नई शुरुआत
वह ही युवा है।।
भोग करके भोग में जो लिप्त न हो,
सत्य-सेवा का वरण करके कभी
इस दम्भ से विक्षिप्त न हो,
‘मार्ग कितना ही कठिन हो आगे बढ़ेंगे’
इस फ़ैसले के बाद कोई
फ़ैसला अतिरिक्त न हो,
‘दर्द सबका दूर करना धर्म मेरा’
इस भावना से जो भरा हो
वह ही युवा है।।
जिसके क़दम प्रतिक्षण मचलते हों
किसी प्रयाण को, दर्दान्त
पर्वत-श्रेणियों पर जो थिरकते,
गतिमान करते पाषाण को,
उफनते सिन्धु पर
अठखेलियों में जो मगन हो,
गति नहीं, अवरुद्ध जल हो,
धरा हो, गगन हो,
उल्लास से भरपूर प्रतिक्षण,
हर परिस्थिति में जो मुस्कुराए
वह ही युवा है।।
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अन्तर्द्वन्द्व
व्यक्ति का हर कर्म मूलाकार में,
क्या वासनाओं का स्फुरण है?
पल-पल छीजते जुड़ते
अहंकारों के गगन में
क्या ग़लत है? क्या सही है?
न्याय क्या? अन्याय क्या?
सम्मान क्या? अपमान क्या?
इन विचारों का पनपना
गुंझनों के सुलझने का
क्या पहला चरण है?
जब विरोधों की चुभन
कुछ रास सी आने लगे,
जब पुराने अनुभवों की तिलमिलाहट
मन्द पड़कर मन को बहलाने लगे,
क्या समझ लूँ ओज घटता जा रहा है?
या निरन्तर बढ़ रहे वय का वरण है?
जब आघात पर प्रतिघात
करने का न मन हो
विद्रूप बोझिल अट्टहासों की प्रतिध्वनि,
मन्द सी मधुस्मित सुमन हो,
चिलचिलाती धूप भी
जब छाँव सी भाने लगे,
दर्द की हर टीस से
जब हृदय गुनगुनाने लगे,
क्या समझ लूँ धार अब
तलवार की मुरदा रही है?
या हृदय में अहिंसा-भाव
का यह अवतरण है?
भावनाओं की नुकीली
चोटियां शान्त होकर
जब पठारों सी लहराने लगें,
प्रतिक्रियाओं की लपकती तीव्रता
उन्माद से बचकर निकल जाने लगे,
कुछ पुरानी दो टूक बेबाकियों से
स्वयं ही जब शरम आने लगे,
पूर्ण अवसर प्राप्त होने के अनन्तर
वार करने से जब मन कतराने लगे,
क्या समझ लूँ डोर
प्रत्यंचा के शिथिल हैं?या अनाच्छादित हृदय में
सत्य का यह अनावरण है?
व्यक्ति का हर कर्म मूलाकार में
क्या वासनाओं का स्फुरण है?
डॉ0 विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’
http://timirrashmi.blogspot.com/
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डॉ0 विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ की कविताओं के बाद चलिए अब चलते हैं उत्सव के द्वितीय चरण में प्रसारित कार्यक्रमों की ओर :
Written by डा. कविता वाचकनवी | August 10, 2011 |
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