हमारे जीवन में ध्यान कितना अहम् और कितना महत्वपूर्ण है इस पर आज प्रकाश डालने जा रही हैं रश्मि प्रभा जी -
ध्यान क्या है?
ध्यान न तो विज्ञान है और न कला ........ बस थोडा धैर्य चाहिए-धैर्यपूर्वक निरीक्षण .....
संभव है - दिन, महीने, साल गुज़र जाएं, पर एक वक़्त आता है जब शांति बिना प्रयास के उतरती है, स्थिरता स्वयं आ जाती है...
ध्यान की कोई तकनीक या तरकीब नहीं - न ही यह तर्कपूर्ण विषय है...... जहा तर्क है वहाँ ध्यान क्या ?
ध्यान का अर्थ है विचार का अंत ..............एक भिन्न आयाम, जो समय से परे है...
ध्यान तुम्हारा स्वभाव है. वह कोई उपलब्धि नहीं है,उसे प्राप्त नहीं करना है ....उसे केवल पहचानना है,याद करना है-वह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है.
कुछ भी मत करो...बस देखते रहो मन क्या कर रहा है.....ध्यान का दूसरा नाम है,निरीक्षण करना,साक्षी होकर देखना .....
बहुत कम लोगों को अपने आतंरिक परिवर्तनों ,द्वन्दों और विकृतियों का बोध होता है.और यदि वे इससे अवगत भी होते हैं तो उससे दूर भागने की कोशिश करते हैं.हम सब सतह पर ही जीते हैं और बहुत थोड़े से ही संतुष्ट हो जाते हैं.
हम शायद ही कभी एकाकी होते हैं.हम सदा लोगों के साथ रहते हैं,विचारों की भीड़ के साथ,उन आशाओं के साथ-जो पूरी नहीं हुई या जो पूरी होने वाली है .अर्थात हम यादों की दुनिया में रहते हैं...पर मनुष्य का एकाकी होना अत्यंत आवश्यक है ताकि एक ऐसी चीज़ का जन्म हो सके जो अदूषित हो.उस ज्योति को प्राप्त करने के लिए शांत और मौन होना आवश्यक है.और ध्यान के लिए मौन होना है या मौन होने के लिए ध्यान करना है.
.आप अपने एकांत में उठते विचारों पर ध्यान दें-मुझे विश्वास है आपको बहुत सारे समाधान मिलेंगे.
मैं २९ सालो से नवरात्रि कर रही हूँ और बहुत कुछ पाया है.......बहुत कुछ जाना है
ध्यान चिकित्सा- शोर से अलग,सूक्ष्म ढंग से एक अलौकिक विचरण,अलौकिक शक्ति,अलौकिक अभिव्यक्ति- शब्द से परे सूक्ष्म ढंग से दूसरे शरीर में प्रवेश और उसे महसूस करना.........साधारण तौर पे ये अविश्वसनीय है- पर होता है. मंत्रों का स्पर्श भी ध्यान प्रक्रिया के द्वारा दिया जाता है.
ध्यान के माध्यम से महामृत्युंजय का विशिष्ट परिणाम दृष्टिगत होता है............शोर नहीं ,दिखावा नहीं-सिर्फ आतंरिक शक्ति और विश्वास इस जाप को सम्पन्न करता है
बस एक मिनट ध्यान के लिए निकालें,आप नहीं जान पाएंगे कि यह अवधि कब बढ़ गई!
हमें यह समझना है कि यूँ भी २४ घंटे का दिन बिना ध्यान के गुजरता ही नहीं. इस बात को समझने के लिए मन् का सहारा लेकर ध्यान करना है ,तभी जान सकोगे कि ध्यान हमारे साथ - साथ हर घडी चलता है,मन से उसका संबंध नहीं.मन में उठते तमाम प्रश्नों का हल हमारे ध्यान में है,जिसे अनजान स्थिति में इधर उधर तलाशते रहते हैं.......
हम ,तुम ,वो - हम सभी एक कमज़ोर प्राणी हैं. सहज ढंग से हम जिन बातों को स्वीकार नहीं करते ,उसे मानने के लिए एक अलौकिक शक्ति का सहारा लेते हैं, जिसे इश्वर ,अल्लाह,गुरु ,मसीहा....हम और आप कहते हैं.माने तो यह शक्ति एक प्रकाश पुंज है, एक शून्य है-जिसके अन्दर चले जाओ तो अंतहीन रास्ते हैं
सृष्टिकर्ता, सृष्टिविनाशक, दोनों हमारे ही अन्दर हैं.अच्छाई का स्वर विनम्र और धीमा होता है, बुराई का शोर अनवरत गूँजता है.मनुष्य सृष्टिकर्ता की पूजा करता है,उससे मांगता है पर सुनता है सृष्टिविनाशक की ! है न अजीब सी बात , पर हम ऐसा ही करते हैं और दोष उस असीम शक्ति को देते हैं ... क्यूँ?
ध्यान करो,शोर को थमने दो,सृष्टिकर्ता की आवाज़ को सुनो.जो जीवन तुम्हे मिला है उसे सही मायनो में जियो.
सिर्फ एक प्रारंभिक सत्य है "ॐ".
"ॐ" सिर्फ शब्द नहीं है - इसमें पूरा ब्रह्माण्ड है.हम जो "ॐ" का उच्चारण करते हैं,वह स्वर लहरी के साथ दूर दूर तक जाता है.ओर सुरक्षा कवच का कार्य करता है...एक बार उच्चारित "ॐ" आस पास के वातावरण में निरंतर घूमता है.उपस्थित हर शरीर का स्पर्श करता है,उनका विकार दूर करता है तो "ॐ" का साथ होना अतिआवश्यक है
हमेशा याद रखो-'मैं हूँ'.......परन्तु मानसिक रूप से विनम्र बनो. लचीला होने में ही शक्ति छुपी है.आंधी तूफ़ान में लचीले पेड़ ही खडे रह पाते हैं.....
एक नदी सब कुछ अपने भीतर सब ग्रहण कर लेती है और फिर कुछ ही मील आगे जाके स्वयम को साफ भी कर लेती है...यदि मन अपनी स्व निर्मित समस्याओं का सामना नहीं करता , तो एक साफ स्पष्ट और गहरा मन नहीं बन सकता, सूक्ष्म मन का होना आवश्यक है और ध्यान द्वारा इसे प्रस्फुटित होने का गहरा और पूरा अवसर दो..
ज़िन्दगी भाग रही है ... इस आपाधापी में इंसान के आगे सिर्फ प्रश्न ही प्रश्न हैं .. आप इसे समझना चाहते हैं तो अपनी दिनचर्या का एक समय ध्यानावस्था में दें ...
अपने आप को हवाओं के स्पर्श के हवाले कर दें ... हवाओं को रोम रोम से अपने अन्दर प्रवाहित होने दें ... एक वक़्त ऐसा आएगा जब आप हर शोर से अलग होंगे , हवा की तरह हलके होंगे , उसके बाद आपके साथ , सिर्फ आपकी अनुभूतियाँ होंगी ...
ध्यान का कोई भी एक सूत्र आपको सब कुछ बताता है और आपका मन आपका गुरु होता है .
ध्यान के संदर्भ में नेपाल के बंजान का ज़िक्र करना चाहूँगी...शायद 2005 में यह खबर मैंने पढी थी "6 महीनों से बंजान ध्यानावस्थित है, न हिलता है न बात करता है.उसके लिए कहा जा रहा है कि गौतम बुद्ध का पुनरजन्म है..."
बात ये प्रमुख नहीं, अर्थ इस बात का है कि ध्यान में कितनी तीव्रता है और अंतर में मन और बुद्धि से परे कितना बड़ा चमत्कार,कितनी बड़ी खोज!!!
क्या है उसके ध्यान में जो निश्चेष्ट बैठा है गुफ़ा में विगत 6 महीनों से!
ध्यान करने के बाद ही आप जान पाएंगे कि इस प्रक्रिया में क्या शक्ति है और क्या चमत्कार है...
एकांत सौभाग्य है...सबसे बड़ा वरदान.जब तुम एकांत को पाते हो तो समझो अब तुम किसी चीज पर निर्भर नहीं रहे.-यही मुक्ति है,यही मोक्ष है.....पर ज़रूरी नहीं कि ध्यान के लिए एकांत हो ही,
समूह में भी आप अकेले हो सकते हैं, काम करते हुए भी आप अपने आप को सुरक्षा चक्र में रख सकते हैं, मन तक पहुंचना आ गया , तो आप बड़ी आसानी से कहीं से भी निकल सकते हैं,
फूलों के मध्य, ॐ के स्वर में , अपनी इच्छा से जा सकते हैं . ॐ एक सुरक्षा है , इसे हर दिन अपने ह्रदय में भरें और अपनों तक उसकी सुवास पहुंचाएं.
मैंने ध्यान किताबी ढंग से नहीं सीखा,
निःसंदेह,मैंने इसे महसूस किया है
और बड़े ही छोटे-छोटे अर्थों में, मैं हवा भी बनी हूँ, दिए की लौ भी ....... और यह सब सरल है !
जब हम अपने बचपन या किसी भी अतीत या भविष्य की सोच के प्रति एकाग्र होते हैं,
तो वह भी ध्यान है,
और ध्यान हमेशा मार्ग प्रशस्त करता है.......
रश्मि प्रभा
http://lifeteacheseverything.blogspot.com/
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दिल्ली के राजीव तनेजा की हास्य-व्यंग्य पढ़ने और लिखने में विशेष रुचि है। वे बी कॉम करने के बाद रैडीमेड दरवाज़े और खिड़कियों का व्यवसाय करते हैं। कुछ कहानियाँ तथा व्यंग्य रचनाएँ प्रकाशित 'हँसते रहो' नाम के एक चिट्ठा लोकप्रिय।
श्रेष्ठ पोस्ट श्रृंखला के अंतर्गत आज प्रस्तुत है ब्लॉग हँसते रहो पर प्रकाशित श्री राजीव तनेजा का एक व्यंग्य व्यथा-झोलाछाप डाक्टर की ......यहाँ किलिक करें
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आज के कार्यक्रम को मैं सुप्रसिद्ध गीतकार श्री राकेश खंडेलवाल जी के दो गीत से संपन्न करने जा रहा हूँ .....यहाँ किलिक करें
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ब्लोगोत्सव में कल अवकाश है इसलिए परसों दिनांक २१.०५.२०१० को मिलते हैं सुबह ११ बजे परिकल्पना पर.....तबतक के लिए मुझे अनुमति दें .....शुभ विदा