चुनाव जब भी आता है दोस्त !
चुनाव जब भी आता है दोस्त ! सजते हैं वन्दनवार हमारे भी द्वार पर और हम- माटी के लोथडे की मानिंद खड़े हो जाते हैं भावुकता की चाक पर करते हैं बस...
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चुनाव जब भी आता है दोस्त !
चुनाव जब भी आता है दोस्त ! सजते हैं वन्दनवार हमारे भी द्वार पर और हम- माटी के लोथडे की मानिंद खड़े हो जाते हैं भावुकता की चाक पर करते हैं बस...
बैल नही हो सकता आदमी कभी भी
एक और कविता गाँव को समर्पित -- आदमी कुत्ता हो सकता है घोडा भी, गदहा भी और बैल भी लेकिन बैल- नही हो सकता आदमी कभी भी। इतिहासकारों ने लिखा ...