बड़े ज़िद्दी, बड़े निडर, बड़े खुद्दार थे मुद्रा
हमारे बीच के फिक्रमंद फनकार थे मुद्रा।

उन्हें इन मील के पत्थरों से क्या मतलब-
जब सफ़र के लिए हर वक्त तैयार थे मुद्रा।

दिन को रात औ रात को दिन कभी न कहा-
तरक्कीपसंद इस क़ौम के तलबगार थे मुद्रा।

उन्हें बस धर्म से, पाखंड से उबकाई आती थी-
विचारों से बहुत मजबूत थे, दमदार थे मुद्रा।

हमारे बीच जिंदा हैं, रहेंगे सोच की हद तक-
वो साया थे फ़क़्त, नक़्श थे, बेदीवार थे मुद्रा।
*रवीन्द्र प्रभात

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