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परिकल्पना - अदृश्य कवच परिकल्पना - अदृश्य कवच

मेरे अपने कुछ वुसूल हैं  … मैं सुख में भी सुमिरन करती हूँ।  ज़रूरी नहीं कि मैं थाल सजाके मंदिर मंदिर जाऊँ  या रोज घी का दीया जल...

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10:30 am

परिकल्पना - कुछ तो है ! .... परिकल्पना - कुछ तो है ! ....

तुम्हारी यादों का कश लेना  जले को और जलाना  रिश्ता ना कहो - कुछ तो है !  ....  आज सोशल मिडिया से लेकर आई हूँ एस के अपाहिज क...

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10:30 am
 
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