परिकल्पना - अदृश्य कवच
मेरे अपने कुछ वुसूल हैं … मैं सुख में भी सुमिरन करती हूँ। ज़रूरी नहीं कि मैं थाल सजाके मंदिर मंदिर जाऊँ या रोज घी का दीया जल...
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परिकल्पना - अदृश्य कवच
मेरे अपने कुछ वुसूल हैं … मैं सुख में भी सुमिरन करती हूँ। ज़रूरी नहीं कि मैं थाल सजाके मंदिर मंदिर जाऊँ या रोज घी का दीया जल...
परिकल्पना - कुछ तो है ! ....
तुम्हारी यादों का कश लेना जले को और जलाना रिश्ता ना कहो - कुछ तो है ! .... आज सोशल मिडिया से लेकर आई हूँ एस के अपाहिज क...