(ग़ज़ल )
पराये शहर में इक हमजुबां हमराज पाया
समंदर लांघने की तब कहीं परवाज़ पाया ।

सड़क के पत्थरों को देख करके यार मैंने-
समय के साथ जीने का सही अंदाज़ पाया ।

मुहब्बत यह उफनती सी नदी है जान लो तुम-
कि जिसमें डूब कर सबने दरद का साज़ पाया ।

खता करके सभी ने मांग ली अपनी रिहाई-
चलो अच्छा हुआ हमने कफ़स का ताज पाया ।

यहाँ खंजर लिए सब घूमते बेख़ौफ़ घूमें-
बड़ी मुश्किल से मेरे हाथ ने इसराज पाया ।

() रवीन्द्र प्रभात

9 comments:

  1. खता करके सभी ने मांग ली अपनी रिहाई-
    चलो अच्छा हुआ हमने कफ़स का ताज पाया ।
    waah

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  2. यहाँ खंजर लिए सब घूमते बेख़ौफ़ घूमें-
    बड़ी मुश्किल से मेरे हाथ ने इसराज पाया
    bahut khoob.

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  3. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  4. मुहब्बत यह उफनती सी नदी है जान लो तुम-
    कि जिसमें डूब कर सबने दरद का साज़ पाया ।

    यहाँ खंजर लिए सब घूमते बेख़ौफ़ घूमें-
    बड़ी मुश्किल से मेरे हाथ ने इसराज पाया ।
    वाह क्या बात है उमदा गज़ल। शुभकामनायें

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  5. kyaa baat hai prabhaat ji, bahut umdaa gazal kahi hai aapane

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  6. सड़क के पत्थरों को देख करके यार मैंने-
    समय के साथ जीने का सही अंदाज़ पाया ।

    हर ख्याल मन को छू गया......
    बेहद सुंदर.....

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