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प्यारे दोस्तों,
मैं आज भी संगीत जगत में एक शिष्य ही हूँ, अतः बड़े ही विनम्र भाव से, मैं  मेरी एक गज़लनुमा गीत-रचना,मेरे ही स्वरांकन-संगीतबद्ध करके पेश कर रहा हूँ । गीतकार-स्वरांकन-संगीत-गायक-मार्कंड दवे ।
स्वरायोजन-प्रसुन चौधरी.
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मौत की आहट (गज़लनुमा गीत)
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हर  साँस  मे  मौत की आहट सुनाई देती  है ।
ज़िंदगी अब तो  गिन-गिन के बदला लेती है ।
 
१.
ज़िंदगी   जीने  मे  जो  माहिर  माने  जाते  थे ।
उनको अब जीने की रीत देखो सिखाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
 
२.
बेआबरु न हो कोई, मैं तो खामोश रहता था ।
कहानी मेरी ही अब मुझ को सुनाई जाती है ।
हर साँस मे ...................

 
३.
मुआफ़  करना  गुस्ताख़ी  अगर  हो  कोई ।
आखरी ख़्वाहिश सभी से तो पूछी जाती है ।
हर साँस मे ...................

मार्कड दवे ।  मई -२३.२००९.

6 comments:

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. @आदरणीय श्री डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण),

    आपका धन्यवाद करते हुए आपके लिए मंगल कामना ।

    मार्कण्ड दवे.

    जवाब देंहटाएं
  5. ॰सुश्री Rajesh Kumari,

    आपका अनेकोनेक धन्यवाद ।

    आपकी कुशलता वांच्छु -मार्कण्ड दवे ।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

 
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