कल्पना और 
एक और कल्पना ........ 
एक और क्यारी
नए बीजों की खोज 
रोपण  - सिंचन - प्रस्फुटन 
समय पर आलोचनात्मक काट-छांट 
प्रशंसा के खाद 
और .............. 
कई नाम 
कई चेहरे 
कई आयाम ............. 
न कल्पना रूकती है, नहीं रुकता उसमें से उगता सूरज 
उम्मीदों का रथ करता जाता है परिक्रमा 
.........
उत्सव समाप्त हुआ, पर कल्पनाएँ समाप्त नहीं हुई हैं - तो अपनी कल्पनाओं का सूत्र देते जाइये - किसान की तरह हम उसे परिकल्पना के विस्तृत मैदान में लगायेंगे - काश्मीर से कन्याकुमारी तक के विचारों को हम आपस में बांटेंगे . तो बदाइये कदम -------

14 comments:

  1. न कल्पना रूकती है, नहीं रुकता उसमें से उगता सूरज
    उम्मीदों का रथ करता जाता है परिक्रमा ............
    शुभकामनायें !!

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  2. इस बगिया में पल्लवित और पुष्पित हर कल्पना का पौध आपके संरक्षण में खूब फलेगा और फूलेगा . आपके इस कृत्या को मेरा आभार !

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  3. उम्मीदों का रथ कभी रुकना भी नहीं चाहिए....
    बहुत प्यारी भावननाएं....

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  4. उम्मीदों का रथ कभी रुकना भी नहीं चाहिए....
    बहुत प्यारी भावननाएं....

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  5. इतनी लंबी यात्रा के बाद तो यह 'परिकल्पना' एक 'सिद्धांत' बन चुकी है.. मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रतीक्षा होगी इस वर्ष के विजेताओं/सम्मानित ब्लॉगर्स से परिचय पाने की.. उत्सुकता बढती रहे और कार्यक्रम सफल हों, यही शुभकामना है!!

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  6. मुझे तो इसी बात का अफ़सोस है कि ब्लोगोत्सव खत्म क्यूँ हुआ , अगले सत्र का इन्तेजार रहेगा |

    सादर

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  7. बहुत सुन्दर...शुभकामनायें!

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  8. परिकल्पना की कल्पना मूर्त रूप ले चुकी है...यह सतत आगे बढ़ती रहे...शुभकामनाएँ !!

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  9. परिकल्पना की कल्पना निरंतर आगे बढ़ती रहे...
    शुभकामनाएँ !!
    recent post: किस्मत हिन्दुस्तान की,

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  10. नए वर्ष में यह वृक्ष फले-फूले...

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