पिछली  बातों  से आगे बढ़ते हैं-

 तरह तरह की जुगत लगाई जाती है, उसे उसकी कहानी सुनाई जाती है, जेलर साहब समेत पूरा स्टाफ़ पुलिस द्वारा गढी गई कहानी का नाटक करके भी दिखाता है, जिसके आधार पर उसकी सजा मुकर्रर की गई थी। अंत में ईश्वर की याददास्त वापस आ जाती है, वह पुलिस से उलट अपनी सच्ची घटना बयान करता है। जिसे सुन कर सब स्तब्ध रह जाते हैं और उसे निर्दोष मानने लगते हैं, लेकिन अदालत के आदेश का पालन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। ईश्वर को पुन: फ़ांसी दी जाती है पर यह फ़ांसी अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाती है।

यह सारांश है कल मुक्ताकाश के नीचे बैठकर मेरे द्वारा देखे गए प्ले का। एक अरसे के बाद मैने कोई प्ले देखा। इस आभासी दुनिया से बाहर निकल कर। नहीं तो यहां के प्ले भी कम नही हैं जो हम देखते हैं। हमारे मित्र बालकृष्ण अय्यर जी एक उच्चकोटि के नाट्य निर्देशक हैं। उनके कई निमंत्रण के बाद भी किसी प्ले में दर्शक के रुप में शामिल हो पाया। इसका आयोजन 36 गढ़ शासन के संस्कृति विभाग द्वारा किया गया था। जिसमें भिलाई के "भारतीय जन ना्ट्य संघ"इप्टा" द्वारा इसे मंचित किया गया था।

निर्देशन की कसावट और शानदार संवाद प्रस्तुतिकरण ने डे्ढ घंटे तक दर्शकों को हिलने नही दि्या।उन्हे बांधे रखा अपने कला कौशल से। जेलर के पात्र में मणिमय मुखर्जी, पंडित के पात्र में राजेश श्रीवास्तव तथा ईश्वर के पात्र में शरीफ़ अहमद ने अपने अभिनय से कायल कर दिया। इस प्ले के लेखक वि्मल बंदोपाध्याय और निर्देशक पंकज मिश्रा जी हैं। उद्घोषक के रुप में बालकृष्ण अय्यर जी ने उत्कृष्ट भूमिका निभाई। अन्य मंच सहयोगियों ने अपनी भुमिका से चार चाँद लगा दिए। प्रकाश एवं ध्वनि संयोजन भी अच्छा था।मैने इस प्ले के कुछ चित्र अपने मोबाईल से लिए हैं रात का समय था इतने तो अच्छे नहीं हैं पर काम चलाऊ हैं प्रस्तुत हैं।


















बालकृष्ण अय्यर मंच पर निर्देशन करते हुए














प्रथम दृश्य"फ़ांसी की सजा देते हुए"














द्वितीय दृश्य" मृत्यु से बच जाना"














तृतीय दृश्य "पंडित का मरने का नाटक करना"














चतुर्थ दृश्य" ईश्वर की याददास्त लौटना और सत्य घटना का बयान करना"















अंतिम दृश्य" कानून के रक्षार्थ ईश्वर को पुन: फ़ांसी पर चढाना"

जीवन की आपा धापी से निकल कर हमें कभी-कभी स्वस्थ्य मनोरंजन भी करना चाहिए, जिससे दिल-दिमाग दुरुस्त रहे और जीवन का वास्तविक आनंद आए, नहीं तो कदम-कदम पर पचड़े हैं और हम उसी में फ़ंसे रहते हैं। "यहां तो रोज फ़ांसी होती है और हम जिंदा बच जाते हैं अगली बार फ़िर से फ़ांसी के फ़ंदे का झट्का खाने के लिए। यही नियति है"....आमीन.....
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आईये अब चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां लखनऊ की प्रिया चित्रांशी उपस्थित हैं अपनी कुछ कविताएं लेकर ....यहाँ किलिक करें
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद

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